28 साल के इंतजार के बाद आये पेसा कानून, ग्राम सभा के पास कितने अधिकार, क्या है कानून में कमियां
- Team BeyondHeadline
- Jan 4
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झारखंड में पेसा लागू हो गया। पेसा कानून वर्ष 1996 में बना था, लेकिन झारखंड में इसके नियम 28 साल तक नहीं बनाए गए। बिना नियमों के कानून सिर्फ कागजों में था। लगातार जनहित याचिकाओं और सामाजिक संगठनों के दबाव के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई और तय समय में नियम लागू करने का आदेश दिया। सवाल है कि क्या इस 28 साल के इंतजार के बाद भी इसे सही तरीके से लागू किया जा सका ?
सवाल क्या हैं
पेसा कानून के लागू होने से क्या ग्रामसभा को वो सारे अधिकार मिले जिसकी मांग की जा रही थी। यह पेसा कानून कितना मजबूत है ? झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सरकार से सवाल किया था कि राज्य में पेसा कानून कब लागू होगा, क्या इसे सिर्फ दबाव में लागू कर दिया गया ? पेसा कानून को लेकर चर्चा अब कम है ऐसे समय में जरूरी है कि वो सारे जरूरी सवाल उठायें जाएं जिससे यह साफ हो सके कि इस कानून के लागू होने के पीछे लाभ किसे मिलेगा। ग्रामीणों को, सरकार को, खनन कंपनियों को या फिर सिर्फ कानून लागू किया गया इसकी शक्तियां कमजोर कर दी गई।
कानून आखिर है क्या ?
पेसा PESA Act (Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act) 1996 . संविधान की 73वीं संशोधित व्यवस्था पंचायती राज को अनुसूचित क्षेत्रों पांचवी अनुसूची लागू करना।आदिवासी समुदायों को स्वशासन, परंपरागत सामाजिक–सांस्कृतिक अधिकार, और संसाधनों पर नियंत्रण देना। ग्रामसभा को सशक्त निर्णय-निर्माता इकाई बनाना — भूमि, जल, जंगल, खनिज संसाधन, नुक़्कड़ निर्णय, आदि में हिस्सा देना।
मुख्य प्रावधान
ग्राम सभा को परंपरागत संसाधनों एवं समुदायिक निर्णयों में प्रमुख भूमिका।
सरकारी प्राधिकरणों द्वारा अनुचित भूमि अधिग्रहण पर ग्राम से सलाह लेना अनिवार्य।
खनिज, वनोपज, पानी पर स्थानीय अधिकार।
सामाजिक मुद्दों, परंपरागत न्याय व्यवस्था में अधिकार।
झारखंड में लागू पेसा कानून में खास क्या है
ग्राम सभा को वास्तविक निर्णय अधिकार मिले जिसमें भूमि, जल, जंगल, जैसी स्थानीय संसाधन व्यवस्थाओं पर भूमि अधिग्रहण के लिये ग्राम सभा की सहमित जरूरी, जंगल संग्रह, उपयोग और विपणन में भी ग्रम सभा का नियंत्रण होगा स्थानीय योजनाओं, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, रेशन दुकानों की निगरानी का अधिकार मिला है। शराब बनाने, बेचने और रखने पर भी ग्राम सभा फैसला ले सकेगा। ग्राम कोष की व्यवस्था होगा ये नियम 13 जिलों में पूरी तरह लागू होंगे तथा 3 जिलों में आंशिक रूप से लागू किये जाएंगे।
अब समस्या क्या है कमियां कहां है
सोशल मीडिया सहित कई मंचों पर कुछ सामाजिक कार्यकर्ता खुलकर अपनी बात रख रहे हैं। दावा है कि नियमावली पेसा के मूल अधिकारों से पूरी तरह मेल नहीं खाती। अब सवाल है क्यों ? ड्राफ्ट नियम पुराने झारखंड पंचायती राज एक्ट 2001 के ढांचे पर आधारित माने जा रहे हैं। ग्राम सभा को केवल सलाह का अधिकार (और पूर्ण प्रत्यक्ष अधिकारके बीच स्पष्ट सीमा नहीं। (यह सक्रिय बहस का मुद्दा है।) परंपरागत नियम, न्याय व्यवस्था के कानूनी मान्यता/परिभाषा में अस्पष्टता अभी भी बरक़रार है। विपक्ष और विश्लेषकों ने सवाल उठाये हैं कि नये नियम परंपरागत लोकतांत्रिक शक्ति को कमजोर कर सकते हैं यदि इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों से बनी है। यही परंपराएं सदियों से आदिवासी समाज को संगठित रखने के साथ-साथ उनके स्वशासन की मजबूत नींव रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड सरकार और कुछ राजनीतिक दल वोटबैंक की राजनीति तथा विदेशी धर्मों के प्रभाव में आकर आदिवासी समाज की जड़ों पर प्रहार कर रहे हैं। सरकारी मशीनरी आदिवासी समाज को उसकी पारंपरिक पहचान और मूल से दूर करने में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा, अदालत के दबाव में सरकार को पेसा कानून लागू करना पड़ा हो, लेकिन आज भी इसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है। जब तक पेसा कानून के वास्तविक अधिकार मूल आदिवासियों और उनकी पारंपरिक ग्रामसभाओं को नहीं सौंपे जाते, तब तक इस कानून का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
हाईकोर्ट और पेसा कानून
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि PESA Act के तहत नियमावली बनाए और दो महीने में लागू करें।हालांकि सरकार इसे समय पर लागू नहीं कर पाई और कोर्ट में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर हुई। कोर्ट ने कहा कि नियमावली के बिना PESA काम नहीं कर सकता और संसाधनों पर ग्राम सभा की मंज़ूरी कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जा सकती। अंतत : हेमंत सरकार ने पेसा कानून पारित किया




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