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खनन की चमक में छिपी चतरा की बर्बादी, टूटी सड़कें, जहरीली हवा, घुटती ज़िंदगी..?

  • Team BeyondHeadline
  • Nov 27, 2025
  • 2 min read
आम्रपाली-मगध कोल प्रोजेक्ट
आम्रपाली-मगध कोल प्रोजेक्ट

लेखक-चतरा से रूपेश कुमार सिंह दिल्ली के प्रदूषण की इन दिनों खूब चर्चा है। झारखंड में सबसे खराब हवा धनबाद की है लेकिन धीरे - धीरे बढ़ रहे खनन क्षेत्र और कोल माइंस का असर राज्य के कई दूसरे शहरों में भी हो रहा है। चतरा जिले के टंडवा में आम्रपाली-मगध कोल प्रोजेक्ट झारखंड की माइनिंग बेल्ट का "इंजन" माना जाता है। इस क्षेत्र में प्रतिदिन हजारों टन कोयला निकाला जाता है। परिवहन के लिए हजारों भारी वाहन दिन-रात दौड़ते हैं। सरकारी खजाने को करोड़ों का योगदान मिलता है, कंपनियां दिन-रात मेहनत कर मुनाफे के नए रिकॉर्ड बना रही हैं।


एक तरफ सिर्फ विकास और प्रगति दिख रही है तो दूसरी तरफ के हवा में फैल रहे प्रदूषण का जिक्र कहीं नहीं है। विकास मॉडल की छाया में एक ऐसा चतरा खड़ा है जिसकी हवा में ज़हर फैल रहा है। लोगों की जिंदगी कोयले की धूल में दबी है। सरकार के भाषणों और रिपोर्टों में इस क्षेत्र को "राज्य की आर्थिक रीढ़" बताया जाता है, पर असलियत यह है कि यही क्षेत्र राज्य की पर्यावरणीय बर्बादी और जनस्वास्थ्य संकट का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। दिन-रात दौड़ते हाइवा, आसमान तक उड़ती कोयले की धूल और टूटी सड़कों की मार-यहां जीना अब किसी सजा से कम नहीं। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं, बुजुर्ग सांस लेने से। लेकिन सरकार को दिखता क्या है...सिर्फ राजस्व? कंपनियों को दिखता क्या है... सिर्फ टन में निकला कोयला? और जनता? जनता सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह गई है-बीमारियों का, प्रदूषण का, और दुर्घटनाओं का। यह कैसी विकास की परिभाषा है कि राजस्व बढ़े, लेकिन इंसानों की सांसें घटें? यह कौन-सा मॉडल है जिसमें कंपनियां नाफा गिनें और ग्रामीण हर दिन मौत से लड़ें? टंडवा के आम्रपाली-मगध में स्थिति इतनी भयावह है कि कई गांवों में धूल ऐसे जमती है जैसे किसी ने राख बिखेर दी हो।



यहां का हर दूसरा घर खांसी, दमा और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहा है। लेकिन कंपनियों की CSR रिपोर्टों में सबकुछ "नियंत्रित" बताया जाता है। यह नियंत्रित नहीं-छिपाया हुआ सच है। सड़कों का हाल पूछिए तो ऐसा लगता है मानो कोल माफिया ने गांवों को युद्धभूमि बना दिया हो। दुर्घटनाएं आम बात हो गई हैं। लोग अब मौत की खबर सुनकर भी चौंकते नहीं-क्योंकि यह हर सप्ताह की कहानी बन चुकी है। मुआवज़ा, रोज़गार और पुनर्वास ये सब किताबों में अच्छे लगते हैं। ज़मीन पर इनकी हालत भी चतरा की सड़कों जैसी है-टूटी, अधूरी और उपेक्षित। सबसे बड़ी बात-सरकार और प्रशासन जानते हैं कि समस्या गंभीर है। कंपनियां जानती है कि नियम टूट रहे हैं। अधिकारी जानते हैं कि हाइवा में ओवरलोडिंग हो रही है। फिर भी कार्रवाई शून्य। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह जनता के स्वास्थ्य के साथ किया जा रहा संगठित अपराध है। अगर सरकार को वाकई लगता है कि यह क्षेत्र "राजस्व की रीढ़" है, तो उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि यहां के लोग उसके उदासीनता की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। राजस्व जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है इंसानी जीवन। लेकिन चतरा में तस्वीर उलटी है। चतरा की यह असल तस्वीर कब तक दिखेगी, यह गहना घना कोहरा कब छटेगा ये पता नहीं। बस चिंता यह है कि हालात इनते खराब ना हो जाएं कि सबकुछ पटरी पर लाना फिर मुश्किल हो...


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