झारखंड की थाली में 229 तरह के साग, आप कितने साग को पहचानते हैं ?
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झारखंड की थाली में मौजूद भोजन में काफी विविधता है। हर मौसम में अलग तरह का पारंपरिक भोजन उपलब्ध है, लेकिन उसे आम लोगों तक लाने के लिए उसकी पहचान और उसके फायदों के बारे में जनता को जागरूक करने की जरूरत है। जिन्हें हम सिर्फ जंगली फूल समझते हैं, उसमें से बहुत सारे साग-सब्जी हैं। पूरे राज्य में 229 तरह के साग मौजूद हैं। प्रदेश में 32 तरह के जंगली फूल साग के रूप में खाए जाते हैं इसके साथ ही अनेक तरह के कन्दमूल, फल, सब्जियां, शहद, मशरुम तथा जंतु प्रजातियां है जो पोषण का भंडार हैं और आज के समय के सुपर फ़ूड के रूप में लोकप्रिय हो रही है। ।
यह सब बातें सोमवार को अभिव्यक्ति फाउंडेशन की ओर से वासन, प्रवाह, भूमिका, कॉमन ग्राउंड, सारथी जस्ट ट्रांजिशन तथा सुखार विरोधी अभियान के साथ विश्वा ट्रेनिंग सेंटर, कांके में आयोजित फूड सिस्टम डायलॉग में की गई। इस डायलॉग में झारखंड की कई सिविल सोसायटी संगठनों के प्रतिनिधि, डॉक्टर, प्रोफेसर और कम्यूनिकेशन एक्सपर्ट्स ने हिस्सा लिया।
चर्चा में शामिल हुए गेस्ट्रोलॉजिस्ट डॉ. मयंक शेखर ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में हमारा खान-पान बिगड़ा है। अब 14 साल के बच्चों को भी पथरी के केस हमारे पास आ रहे हैं । हमारे आहार परिवर्तन में परम्परागत खाद्य सामग्री के सिमट जाने के कारण इरिटेटेड बोल सिंड्रोम की समस्या हो रही है। वहीँ भोजन में रसायन और कृत्रिम रंग, हानिकारक उर्वरक तथा कीटनाशकों के प्रयोग से कैंसर, डायबिटीज, थायरॉइड आदि बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इंसानी शरीर ज्यादा काम कर के कम खाने के लिए बना है, लेकिन हम जो भी खा रहे हैं, उसके अनुपात में मेहनत कम कर रहे। साथ ही पिछले 40 साल में हमारा फूड चेन भी बदला है।हम मिलेट्स खाने वाले लोग थे, लेकिन अब हमारी प्लेट में वो खाना उपलब्ध ही नहीं है। खाने के मामले में हमें हमारे बेसिक्स पर लौटना होगा। हमारे बुजुर्गों ने इस बात को समझा था, इसीलिए हम देखते हैं कि देश के लगभग हर राज्य की थाली में सब्जियों की संख्या काफी ज्यादा है।
क्यों जरूरी है एग्रो-इकोलॉजी ?
सिर्फ झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश में इस वक्त खाने की विविधता पर चर्चा हो रही है। झारखंड सहित कई राज्य सरकारें एग्रो-इकॉलोजी की जरूरत महसूस कर रही हैं। क्योंकि एग्रो-इकॉलोजी से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी, पर्यावरणीय संतुलन, किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार और स्वास्थ्य एवं पोषण में काफी सुधार होता है। कई अनुसंधान इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में पोषण गुणवत्ता और पोषक तत्वों की मात्रा बहुत घटी है और एग्रो इकोलॉजी के माध्यम से हमारे खाद्य उत्पादन को सुरक्षित और पोषण गुणवत्ता से भरपूर बनाया जा सकता है और पर्यावरण दुष्प्रभावों से भी बचा जा सकता है ।
जानिए किस एक्सपर्ट ने क्या कहा?
फूड सिस्टम डायलॉग में कई विषय विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी। डॉ. रतन हेम्ब्रोम ने कहा कि हमारे इलाके में कुछ दशक पहले तक मकई का काफी मात्रा में इस्तेमाल किया जाता था। खेती में गाय, भैंस, बकरी का खाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता था। पहले हमारे गांव में 200-300 क्विंटल खेती तो बिना खाद के ही होती थी क्योंकि जंगल और पहाड़ से टूटे पत्ते खेतों में जमा होते और उससे खाद बनती। लेकिन पिछले तीन दशक में अवैज्ञानिक और स्थानीयता को नजरअंदाज करते हुए बढ़ाई गई हरियाली से काफी नुकसान हुआ है। अब भू-जल स्तर भी नीचे चला गया। खेतों में नमी कम होने से केंचुआ, जोंक भी खत्म हो गए। इसीलिए अब समय आ गया है कि हम अपनी पारंपरिक समझ को फिर से खेती में उपयोग लें।
असर से मुन्ना झा ने मीडिया के संबंध में बोलते हुए कहा कि आजकल हर चीज का एक बाजार है। मीडिया भी इसी बाजार का हिस्सा है। हमें अपने पारंपरिक खानों को इसी बाजार से जोड़ना होगा या इनके लिए अलग से बाजार खड़ा करना होगा। क्योंकि अगर आप रांची के ही हाट या बाजार देखेंगे तो हर मौसम में यहां कई तरह की साग-सब्जी बिकती हुई दिखाई देती हैं, जो आमतौर पर अब हमारे खाने का हिस्सा नहीं रही हैं। जरूरत ऐसे भोजन को मीडिया के जरिए आम लोगों तक पहुंचाने की है, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है।
अंकिता ने शहरी क्षेत्र में रह रही महिलाओं की दुविधा पर बताते हुए कहा कि आज सुरक्षित और पोषक खाद्य परिवार के लिए मिलना मुश्किल होता जा रहा है सुपर स्टोर में मिलने वाले आर्गेनिक खाद्य महंगे हैं वहीँ सस्ते दाम पर प्राकृतिक सब्जी फल आदि बेचने वालो तक शहरी समुदाय कि पहुँच मुशिकल होती जा रही है।
पादप विज्ञानी प्रोफेसर सुधांशु ने झारखण्ड में 30 वर्ष से किये जा रहे अपने शोध के आधार पर बताया कि यहां 229 से अधिक तरह के साग उपलब्ध हैं जिनमें से कई यहाँ भोजन में उपयोग किये जाते हैं वहीँ बड़ी संख्या ऐसे साग प्रजातियों की है जो दुसरे राज्य में खाये जाते हैं परन्तु हमारे राज्य में इन्हे खाने का प्रचलन नहीं है। इसपर व्यापक प्रसार से राज्य में कुपोषण को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस अवसर पर राज्य के सभी क्षेत्र संताल परगना, कोल्हान, पलामू, उत्तरी तथा दक्षिणी छोटानागपुर से आये किसान उत्पादक संघ, खाद्य उद्यमियों सीसी स्वयं सहायता समूह, पाली आर्गेनिक, मिली लाइफ सहित विभिन्न जैव इनपुट उत्पादकों ने भी अपने विचारो को रखा और स्वास्थ्यपूर्ण जीवन के लिए स्थानीय भोजन के संरक्षण व् संवर्धन के लिए जोर दिया । मौके पर राज्य के विभिन्न क्षेत्रो से आये किसानो और उद्यमियों द्वारा स्थानीय खाद्य विविधता और खाद्य उत्पादन कि प्रदर्शनी भी लगाई जिसमे वन्य खाद्य, मोटे अनाज के उत्पादन और कई प्रकृतिक तथा सुरक्षित खाद्य ने लोगो को यहां की भोजन और सांस्कृतिक विरासत को रुचिकर तरीके से दिखलाया गया।
परिचर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि जन स्वास्थ्य और पोषण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय खाद्य व्यवस्था को प्रोत्साहित करने कि जरुरत है जो कि यहां के छोटे किसानों, उत्पादकों, खाद्य उद्यमियों के आजीविका और रोजगार के बेहतर अवसर उत्पान करेगी और साथ ही जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए राज्य में उपयोगी होगी।




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